माउंट एवरेस्ट का ‘डेथ ज़ोन’ क्यों कहलाता है मौत का रास्ता? जहां बर्फ में दफन हैं कई भारतीय पर्वतारोही
वायरल भारत | विशेष रिपोर्ट
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना हर पर्वतारोही का सपना होता है, लेकिन यह सपना कई बार जानलेवा भी साबित हो जाता है। एवरेस्ट का एक हिस्सा ऐसा है जिसे ‘डेथ ज़ोन’ (Death Zone) कहा जाता है।
यहां ऑक्सीजन का स्तर इतना कम होता है कि मानव शरीर लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। यही वजह है कि इस क्षेत्र में सैकड़ों पर्वतारोहियों ने अपनी जान गंवाई है और कई शव आज भी वहीं बर्फ में दबे पड़े हैं।
क्या है एवरेस्ट का डेथ ज़ोन?
माउंट एवरेस्ट पर लगभग 8,000 मीटर (26,247 फीट) की ऊंचाई के बाद का क्षेत्र डेथ ज़ोन कहलाता है। इस ऊंचाई पर वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा समुद्र तल की तुलना में लगभग एक-तिहाई रह जाती है शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलने से सांस लेने में दिक्कत, भ्रम, थकान और अंगों के काम करना बंद होने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
क्यों नहीं हटाए जाते शव?
एवरेस्ट के डेथ ज़ोन में किसी पर्वतारोही का शव नीचे लाना बेहद कठिन और जोखिम भरा काम होता है। खराब मौसम, तेज हवाएं और खतरनाक रास्तों के कारण शवों को नीचे लाने में लाखों रुपये खर्च होते हैं और कई लोगों की जान भी खतरे में पड़ सकती है। इसी कारण अधिकांश शव वहीं बर्फ और चट्टानों के बीच रह जाते हैं।
कई भारतीय भी गंवा चुके हैं जान
एवरेस्ट अभियान के दौरान कई भारतीय पर्वतारोहियों की भी मौत हो चुकी है। खराब मौसम, ऑक्सीजन की कमी और अत्यधिक थकान जैसी वजहों से कई भारतीयों ने इस खतरनाक क्षेत्र में दम तोड़ा। इनमें से कुछ के शव आज भी एवरेस्ट के रास्तों पर मौजूद हैं।
शव बन गए रास्ते की पहचान
एवरेस्ट के कुछ हिस्सों में वर्षों से पड़े शव पर्वतारोहियों के लिए रास्ते की पहचान बन गए हैं। कई पर्वतारोही इन्हें लैंडमार्क के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यह स्थिति पर्वतारोहण की भयावह सच्चाई को भी उजागर करती है।
हर साल बढ़ रहा खतरा
एवरेस्ट पर चढ़ने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भीड़, मौसम में अचानक ऊंचाई पर लंबे समय तक इंतजार करने के कारण दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ गया है। यही वजह है कि डेथ ज़ोन आज भी दुनिया के सबसे खतरनाक स्थानों में गिना जाता है।

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